विकास को तरसता समृद्ध सोनभद्र


सोनभद्र से अरविन्द कुमार सिंह ‘स्वामी’

whatwedoदेश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े जिलों में से एक सोनभद्र्र इलेक्ट्रोनिक पॉवर स्टेशन होने के कारण पॉवर की राजधानी के नाम से जाना है वहीं दूसरी ओर आदिवासियों का यह जिला अपने पिछड़ेपन के लिए भी हमेशा चर्चा में बना रहता है। अपने साथ हमेशा से ही छलावा झेलता सोनभद्र जनपद की अव्यवस्थित व्यवस्था पर सवालिया निशान तो हमेशा से लगते रहे हैं। सोनभद्र जनपद में अवैध खनन और उसके दौरान होने वाली मौतें हमेशा अखबारों की सुर्खियां बनती रहीं हैं। प्रकृति भक्षकों के इस देश में अवैध खनन को लेकर हमेशा से ही सुर्खियों में रहने वाले सोनभद्र के सिंगरौली पट्ïटी में पत्थरों का गोरखधंधा बदस्तुर जारी है।
प्रदेश सरकार के संरक्षण में कराये जा रहे गिट्ïटी बालू के अवैध खनन देश में काली कमाई का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है। ये बात आश्र्चजनक किन्तु सत्य है कि सोनभद्र का खनन घोटाला देश के किसी भी खनन घोटालों से कहीं ज्यादा है। इस घोटाले में न सिर्फ मौजूदा सरकार बल्कि पूर्व की सरकारें भी बराबर की हिस्सेदार रही हैं। सोनभद्र में हो रहे इस अवैध खनन में प्रदेश के तमाम मंत्रियों और नौकरशाहों के अलावा तमाम बाहुबली और पत्रकार भी शामिल हैं। इस खनन से तमाम पारिस्थिकी छिन्न-भिन्न हो गयी है, कल तक जो खेत लहलहा रहे थे, अब वहां बंजर का मंजर देखा जाना सहज है। इस सहजता के बीच असहजता तो यह देखकर तब होती है कि सरकारी तो सरकारी सूबे की तमाम गैर सरकारी संस्था भी इस गोरखधंधे को लेखर अपने होंठ सिये हुए हैं।
सोनभद्र जिला हमारे लोकतंत्र के खोखलेपन का एक जीता-जागता उदाहरण बनकर रह गया है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित यहां के स्थानीय आदिवासियों की स्थिति यह है कि उन्हें रोजगार के नाम पर मजदूरी के अलावा अन्य साधन शायद ही मुहैय्या हो सका हो। अवैध खनन में मजदूर के रूप में काम कर रहे इन मजदूरों की मौत के भी सैकड़ों हादसे हो चुके हैं। बावजूद इस अवैध खनन के मायाजाल में वहां तक किसी की नजर नहीं पहुंच पा रही है।
कभी अपने जंगलों, पहाडिय़ों और अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता था। लेकिन आज इस इलाके में फ्लोराइड और मरकरी मिला पानी लोगों को अपाहिज बना रहा है। जनपद के कई गांवों में इसके दुष्प्रभाव से अपंग हो चुके लोगों को आशा की किरण नहीं नजर आ रही है। उन लोगों की मानें तो वो लोग अपने अपंग शरीर का फोटो देकर (मीडिया एवं अन्य स्वयंसेवी संगठनों) को थक चुके हैं। कोई कुछ भी ठोस कदम नहीं उठा रहा है। हालांकि हाल ही में इस मसले को लेकर संसद में आवाज सुनाई दी। लेकिन इन सबके बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।


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